History

महाराव शेखा जी : नारी सम्मान रक्षक, शेखावत वंश के संस्थापक | सम्पूर्ण जीवन परिचय एवं इतिहास itihas

भारत के इतिहास में सैकड़ो वीर पुरुष हुवे, इसमें राजस्थान को वीरो की भूमि कहा जाता हे।  राजस्थान का एक अहम् भाग हे शेखावाटी।

आज हम आपको शेखावाटी और शेखावत वंश के संस्थापक महाराव शेखा जी की वीरता और शौर्य के विषय में संक्षिप्त जानकारी देने जा रहे हे , आशा हे आपको सबको जानकारी पसंद आएगी।

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वीर शिरोमणि महाराव शेखा जी का जीवन इतिहास

——महाराव शेखा जी——

शेखावाटी के जनक राव शेखा का जन्म आसोज सुदी विजयादशमी स. 1490 वि. स. में बरवाडा व नाण के स्वामी मोकल सिंहजी कछवाहा की रानी निरबाण जी के गर्भ से हुआ था, 12 वर्ष की छोटी आयु में इनके पिता का स्वर्गवास होने के उपरांत राव शेखा वि. सं. 1502 में बरवाडा व नाण के 24 गावों की जागीर के उतराधिकारी हुए |

आमेर नरेश इनके पाटवी राजा थे राव शेखा अपनी युवावस्था में ही आस पास के पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण कर अपनी सीमा विस्तार करने में लग गए और अपने पैत्रिक राज्य आमेर के बराबर 360 गावों पर अधिकार कर एक नए स्वतंत्र कछवाह राज्य की स्थापना की |

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अपनी स्वतंत्रता के लिए राव शेखा जी को आमेर नरेश राजा चंद्रसेन जी से जो शेखा जी से अधिक शक्तिशाली थे छः लड़ाईयां लड़नी पड़ी और अंत में विजय शेखाजी की ही हुई,अन्तिम लड़ाई मै समझोता कर आमेर नरेश चंद्रसेन ने राव शेखा को स्वतंत्र शासक मान ही लिया |

महाराव शेखा जी ने अमरसर नगर बसाया , शिखरगढ़ , नाण का किला,अमरगढ़,जगन्नाथ जी का मन्दिर आदि का निर्माण कराया जो आज भी उस वीर पुरूष की याद दिलाते है |

राव शेखाजी एक धर्म निरपेक्ष राजा

शेखाजी जहाँ वीर,साहसी व पराक्रमी थे वहीं वे धार्मिक सहिष्णुता के पुजारी थे उन्होंने 1200 पन्नी पठानों को आजीविका के लिए जागीरे दी व अपनी सेना मै भरती करके हिन्दूस्थान में सर्वप्रथम धर्मनिरपेक्षता का परिचय दिया |

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उनके राज्य में सूअर का शिकार व खाने पर पाबंदी थी तो वहीं पठानों के लिए गाय,मोर आदि मारने व खाने के लिए पाबन्दी थी |

वह दुष्टों व उदंडों के तो काल थे एक स्त्री की मान रक्षा के लिए अपने निकट सम्बन्धी गौड़ वाटी के गौड़ क्षत्रियों से उन्होंने ग्यारह लड़ाइयाँ लड़ी और पांच वर्ष के खुनी संघर्ष के बाद युद्ध भूमि में विजय के साथ ही एक वीर क्षत्रिय की भांति प्राण त्याग दिए |

शेखाजी की मृत्यु

वीर योद्धा राव शेखा की मृत्यु रलावता गाँव के दक्षिण में कुछ दूर पहाडी की तलहटी में अक्षय तृतीया वि.स.1545 में हुई जहाँ उनके स्मारक के रूप में एक छतरी बनी हुई है | जो आज भी उस महान वीर की गौरव गाथा स्मरण कराती है |

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राव शेखा अपने समय के प्रसिद्ध वीर.साहसी योद्धा व कुशल राजनिग्य शासक थे,युवा होने के पश्चात उनका सारा जीवन लड़ाइयाँ लड़ने में बीता | और अंत भी युद्ध के मैदान में ही एक सच्चे वीर की भांति हुवे।

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जय माँ भवानी। जय राजपुताना

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