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सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का इतिहास | Mihirbhoj Pratihar History in Hindi

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राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ( Mihirbhoj Pratihar ) या मिहिर भोज आदिवराह इन्हे अन्य कई नामों से भी जाना जाता है, भारत में सनातन काल से ही क्षत्रियों ने शाशन किया है, कहते हे की क्षत्रियों की वीरता के किस्से स्वर्ग तक जाते थे, और उनकी परीक्षा लेने स्वं भगवान धरती पर अवतरित होते थे। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की वीरता और प्रजापालक छवि के कारण ही भारत को सोने की चिड़िया कहाँ जाता था, दूर अफगान तक इनका साम्राज्य फैला था। आज हम आपको सम्राट मिहिर भोज के जीवन से परिचय करवा रहे है आशा हे यह लेख आपको पसंद आएगा। 

सम्राट इतने वीर योद्धा थे की उन्होंने भारतीय संस्कृति के शत्रु म्लेछो यानि मुस्लिम तुर्को -अरबो को मिहिरभोज प्रतिहार ने पराजित ही नहीं किया अपितु उन्हें इतना भयाक्रांत कर दिया था की वे आगे आने वाली एक शताब्दी तक भारत की और आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं कर सके।

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सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार संक्षिप्त परिचय 

नामसम्राट मिहिरभोज प्रतिहार
पिता का नामश्री रामभद्र प्रतिहार
माता का नामअप्पादेवी जी
जन्मविक्रम संवत 873 (816 ईस्वी)
वंश प्रतिहार क्षत्रिय वंश ( लक्ष्मण जी के वंशज ) सूर्यवंशी
जन्म स्थानकन्नौज
पत्नी का नामचंद्रभट्टारिका देवी ( भाटी राजपूत वंश )
पुत्र का नाम महेन्द्रपाल प्रतिहार प्रथम
मृत्युविक्रम संवत 930 (885 ईस्वी) को नर्मदा नदी के तट पर
उपलब्धिएक ऐसा राजपूत क्षत्रिय योद्धा  जिसने अरबों से  लगभग 40 युद्ध कर अरबों को भारत से पलायन करने पर मजबूर कर दिया एवं सनातन धर्म की रक्षा की, ऐसे थे महान चक्रवर्ती सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जिसने भारत पर 50 वर्ष शासन किया।
मिहिरभोज प्रतिहार

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का जीवन परिचय 

आदिवराह क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज अग्निवंशी क्षत्रियों की शाखा प्रतिहार वंश में जन्मे थे। सम्राट मिहिरभोज का जन्म विक्रम संवत 873 (816 ईस्वी) को हुवा था। सम्राट के पिता श्री का नाम रामभद्र था और माता जी का नाम अप्पादेवी था। इतिहास के अनुसार इनके पिता के संतान नहीं होने पर राजा रामभद्र और माता जी ने भगवान् सूर्य की कठिन साधना की थी उसके फलस्वरूप ईश्वर ने आशीर्वाद के रूप में मिहिरभोज के रूप में पुत्र की प्राप्ति हुई थी। 

क्षत्रिय सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का महज 20 वर्ष की आयु में उनके जन्मदिवस पर विक्रम संवत 893 यानी 18 अक्टूबर दिन बुधवार 836 ईस्वी को राज्याभिषेक हुवा था। वर्तमान में इसी दिन मिहिर भोज प्रतिहार की जयंती भी मनाई जाती है। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जी की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था। जो भाटी राजपूत वंश की थी। इनके पुत्र का नाम महेन्द्रपाल प्रतिहार था जो सम्राट मिहिरभोज के स्वर्गवास उपरांत कन्नौज की गद्दी पर बैठे थे ।

Samrat Mihirbhoj मिहिरभोज प्रतिहार का साम्राज्य 

मिहिरभोज सम्राट का विशाल साम्राज्य पुरे भारत वर्ष में फैला था। आप इसी बात से अंदाजा लगा लीजिये की इनके साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में वर्तमान के मुल्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में जम्मू कश्मीर से लेकर दक्षिण में महाराष्ट्र से कर्नाटक तक था। सम्राट मिहिरभोज गुणी बलवान , न्यायप्रिय , सनातन धर्म रक्षक , प्रजा हितैषी एवं राष्ट्र रक्षक थे। प्रतिहार/परिहार वंश ने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये जिसका परिणाम है कि हम आज यहां सुरक्षित है।

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मिहिरभोज प्रतिहार का जीवन परिचय 

प्रतिहारों ने अपनी वीरता, शौर्य , कला का प्रदर्शन कर सभी को आश्चर्यचकित किया है। भारत देश हमेशा ही प्रतिहारो का ऋणी रहेगा उनके अदभुत शौर्य और पराक्रम का जो उन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए न्यौछावर किया है। जिसे सभी विद्वानों ने भी माना है। प्रतिहार साम्राज्य ने दस्युओं, डकैतों, अरबों, हूणों, से देश को बचाए रखा और देश की स्वतंत्रता पर आँच नहीं आई।

इनका राजशाही निशान वराह है। ठीक उसी समय मुश्लिम धर्म का जन्म हुआ और इनके प्रतिरोध के कारण ही उन्हे हिंदुश्तान मे अपना राज कायम करने मे 300 साल लग गए। और इनके राजशाही निशान ” वराह ” विष्णु का अवतार माना है प्रतिहार मुश्लमानो के कट्टर शत्रु थे । इसलिए वो इनके राजशाही निशान ‘बराह’ से आजतक नफरत करते है।

आदिवराह चर्कवर्ती मिहिरभोज प्रतिहार की सेना 

भारत वर्ष में सर्वप्रथम सेना को नगद राशि प्रदान करने की प्रथा प्रतिहार क्षत्रिय शासकों ने ही शुरू की थी सर्वप्रथम नागभट्ट प्रथम ने यह लागु किया था जो आगे चलकर राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के शासन में पूर्ण रूप से सुदृढ़ हो गई थी। विक्रम संवत 972 (915 ईस्वी) में भारत भ्रमण आये बगदाद के इतिहासकार अलमसूदी ने अपनी किताब मिराजुल – जहाब में इस महाशक्तिशाली , महापराक्रमी सेना का विवरण किया है। उसने इस सेना की संख्या लाखों में बताई है। जो चारो दिशाओं में लाखो की संख्या में रहती है।

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प्रसिद्ध इतिहासकार के. एम. मुंशी ने सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की तुलना गुप्तवंशीय सम्राट समुद्रगुप्त और मौर्यवंशीय सम्राट चंद्रगुप्त से इस प्रकार की है। वे लिखते हैं कि सम्राट Mihirbhoj Pratihar इन सभी से बहुत महान थे। क्योंकि तत्कालीन भारतीय धर्म एवं संस्कृति के लिए जो चुनौती अरब के इस्लामिक विजेताओं की फौजों द्वारा प्रस्तुत की गई। वह समुद्रगुप्त , चंद्रगुप्त आदि के समय पेश नही हुई थी और न ही उनका मुकाबला अरबों जैसे अत्यंत प्रबल शत्रुओं से हुआ था।

भारत के इतिहास में मिहिरभोज से बडा आज तक कोई भी सनातन धर्म रक्षक एवं राष्ट्र रक्षक नही हुआ। एक ऐसा राजपूत क्षत्रिय योद्धा  जिसने अरबों से  लगभग 40 युद्ध कर अरबों को भारत से पलायन करने पर मजबूर कर दिया एवं सनातन धर्म की रक्षा की, ऐसे थे महान चक्रवर्ती सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जिसने भारत पर 50 वर्ष शासन किया।

मिहिरभोज प्रतिहार का इतिहास

मिहिरभोज प्रतिहार की सैना में 8,00,000 से ज्यादा पैदल करीब 90,000 घुडसवार,, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में सोना और चांदी सड़कों पर विखरा था-किन्तु चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। जरा हर्षवर्धन बैस के राज्यकाल से तुलना करिए। हर्षवर्धन के राज्य में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे,पर मिहिरभोज के राज्य में खुली जगहों में भी चोरी की आशंका नहीं रहती थी।

राजपूत सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार की शासन व्यवस्था

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार वीरता, शौर्य और पराक्रम के प्रतीक हैं। उन्होंने विदेशी साम्राज्यो के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अपनी पूरी जिन्दगी  मलेच्छो से पृथ्वी की रक्षा करने मे बिता दी। सम्राट मिहिरभोज बलवान, न्यायप्रिय और धर्म रक्षक सम्राट थे। सिंहासन पर बैठते ही मिहिरभोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया।

व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार राजपूत साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में उन्हें  ‘सम्राट’ मिहिरभोज प्रतिहार “आदिवराह” की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे कई महान विशेषणों से वर्णित किया गया है।

सम्राट मिहिर भोज महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकालकर उसकी रक्षा की थी। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का नाम आदिवाराह भी है। ऐसा होने के पीछे यह मुख्य कारण हैं :- जिस प्रकार वाराह (विष्णु जी) भगवान ने पृथ्वी की रक्षा की थी और हिरण्याक्ष का वध किया था ठीक उसी प्रकार मिहिरभोज ने मलेच्छों को मारकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की। इसीलिए इन्हे आदिवाराह की उपाधि दी गई है।

शिव शक्ति के उपाशक थे मिहिरभोज प्रतिहार

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार शिव शक्ति के उपासक थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में भगवान शिव के प्रभास क्षेत्र में स्थित शिवालयों व पीठों का उल्लेख है। प्रतिहार साम्राज्य के काल में सोमनाथ को भारतवर्ष के प्रमुख तीर्थ स्थानों में माना जाता था। प्रभास क्षेत्र की प्रतिष्ठा काशी विश्वनाथ के समान थी। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है।

Mihirbhoj Pratihar के संबंध में कहा जाता है कि वे सोमनाथ के परम भक्त थे उनका विवाह भी सौराष्ट्र में ही हुआ था। उन्होंने मलेच्छों से पृथ्वी की रक्षा की। 50 वर्ष तक राज करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल प्रतिहार को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे। सम्राट मिहिरभोज का सिक्का जो कन्नौज की मुद्रा था उसको सम्राट मिहिरभोज ने 836 ईस्वीं में कन्नौज को देश की राजधानी बनाने पर चलाया था।

आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया था राजपूत सम्राट Mihirbhoj Pratihar ने

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार महान के सिक्के पर वाराह भगवान जिन्हें कि भगवान विष्णु के अवतार के तौर पर जाना जाता है। इनके पूर्वज सम्राट नागभट्ट प्रथम ने स्थाई सेना संगठित कर उसको नगद वेतन देने की जो प्रथा चलाई वह इस समय में और भी पक्की हो गई और प्रतिहार साम्राज्य की महान सेना खड़ी हो गई। यह भारतीय इतिहास का पहला उदाहरण है, जब किसी सेना को नगद वेतन दिया जाता हो।

मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। इनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी। भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।

अरबी लेखकों ने भी किया था मिहिरभोज प्रतिहार का गुणगान

1. अरब यात्री सुलेमान – पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं :

जब वह भारत भ्रमण पर आया था। सुलेमान सम्राट मिहिरभोज के बारे में लिखता है कि इस सम्राट की बड़ी भारी सेना है। उसके समान किसी राजा के पास उतनी बड़ी सेना नहीं है। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि भारत में सम्राट मिहिरभोज से बड़ा इस्लाम का कोई शत्रु नहीं था । मिहिरभोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की सर्वश्रेष्ठ सेना है। इसके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। ये भी कहा जाता है।कि उसके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी।

2. बगदाद का निवासी अल मसूदी 915ई.-916ई

वह कहता है कि प्रतिहार साम्राज्य में 1,80,000 गांव, नगर तथा ग्रामीण क्षेत्र थे तथा यह दो किलोमीटर लंबा और दो हजार किलोमीटर चौड़ा था। राजा की सेना के चार अंग थे और प्रत्येक में सात लाख से नौ लाख सैनिक थे। उत्तर की सेना लेकर वह मुलतान के बादशाह और दूसरे मुसलमानों के विरूद्घ युद्घ लड़ता है। उसकी घुड़सवार सेना देश भर में प्रसिद्घ थी। जिस समय अल मसूदी भारत आया था उस समय मिहिरभोज तो स्वर्ग सिधार चुके थे परंतु प्रतिहार शक्ति के विषय में अल मसूदी का उपरोक्त विवरण मिहिरभोज के प्रताप से खड़े साम्राज्य की ओर संकेत करते हुए अंतत: स्वतंत्रता संघर्ष के इसी स्मारक पर फूल चढ़ाता सा प्रतीत होता है।

समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था,क्योंकि प्रतिहार राजपूत राजाओं ने 11 वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवर्त का महान सम्राट कहा जाता था।

3. कश्मीर के राज्य कवि कल्हण

कवी ने अपनी पुस्तक राज तरंगणी में सम्राट मिहिरभोज का उल्लेख किया है। उनका विशाल साम्राज्य बहुत से राज्य मंडलों आदि में विभक्त था। उन पर अंकुश रखने के लिए दंडनायक स्वयं सम्राट द्वारा नियुक्त किए जाते थे। योग्य सामंतों के सुशासन के कारण समस्त साम्राज्य में पूर्ण शांति व्याप्त थी। सामंतों पर सम्राट का दंडनायकों द्वारा पूर्ण नियंत्रण था।

FAQ’s

मिहिरभोज परिहार कौन थे?

मध्यकालीन भारत के इतिहास में क्षत्रिय प्रतिहार वंश में जन्मे मिहिरभोज प्रतिहार सबसे शक्तिशाली शासक थे, जिन्होंने कन्नौज पर 836 ईस्वी से लेकर 885 ईस्वी तक शासन किया था।

प्रतिहार कौन सी जाती है?

प्रतिहार क्षत्रिय कुल का गोत्र है। प्रतिहार वंशी राजपूत भारत में मुख्य्तः राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात सहित दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में निवास करते हैं। प्रतिहार वंश को परिहार, प्रतिहार या पड़िहार नामों से जाना है। प्रतिहार क्षत्रिय वंश का निकास सूर्यवंशी पुरुषोत्तम श्री राम के अनुज श्री लक्ष्मण जी से हुआ था।

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की जयंती कब आती है?

सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार की जयंती हर वर्ष 18 अक्टूबर को मनाई जाती है।

निष्कर्ष

राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ( Mihirbhoj Pratihar ) पर लिखा हमारा यह लेख आपको कैसा लगा निचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताये। हमारी इस ब्लॉग वेबसाइट राजपुताना मीडिया नेटवर्क पर यही प्रयास रहता हे की युवाओ को सही इतिहास से परिचय करवा सके, इसलिए समय समय पर हम ऐसे लेख यहाँ प्रकाशित करते रहते है।

अगर आपको मिहिरभोज प्रतिहार पर लिखा यह लेख पसंद आया हे तो हमारा उत्साह वर्धन करने हेतु आप अपने मित्रों के साथ अन्य सोसिअल नेटवर्क जैसे facebook और whatsapp एवं twitter पर शेयर जरूर करे।

Vijay Singh Chawandia

I am a full time blogger, content writer and social media influencer who likes to know about internet related information and history.

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2 Comments

  1. बहुत ही लाजवाब जानकारी दी है विजय भाई आपने 👌 अभिज्ञान दर्पण की पूरी टीम को आभार देता हूं। राजपूत सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार जी के जीवन पर सटीक प्रकाश डाला है आपने ।

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